Thursday, March 1, 2012

आँख छलक आई

आज आँख छलक आई है,
कुछ धुन्दला-धुन्दला सा ही दिखता है
आज उनके जाने का दिन है
पर हर आने के दिन भी येही होता है

एक लम्हा मिले तो पूछेंगे
क्यों हमसे आँख मिचोली करता है
ढून्ढ रही उनको ही  आँखें
वोह छुप छुप के ही मुझसे मिलता है

मिलने का दिन दूर अभी तो
यह लम्बा इंतज़ार मुझसे नहीं कटता है
पूछने पर भी नहीं बताता
एक रोज़ पहले आने से क्या बिगड़ता है

जानता है ये बेताबी मेरी
वोह फिर भी बस दूर से मुस्कुराता है
देख मुझे आपनी खिड़की से
मुंह मोद्द के वहां से तो चला जाता है

यकीं मुझे भी है उसपे
वोह छुप छुप के बस यहीं देखता है
कुछ दिल में है उकसे भी
पर वोह भी इज़हार करने से डरता है

जानते हैं हाल हम दोनों
दोनों में कोई कह कुछ नहीं पाता है
मिलने पर नज़र नहीं हटती
पर नज़र मिलाने से दिल घबराता है

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