हज़ार रंग आंखों में थे
रंग सब छोड़ दिए मैंने
एक तेरे रंग में रंगने को
बसंत को उद्देळ दिया मैंने
कलियाँ कब से बैठी थी
कलियों को छोड़ दिया मैंने
उन रंगों और उन खुश्बूँ को
तेरे रंग में घॊल दिया मैंने
जाने कब आयी ऋतू गर्मी की
तेरी आस में भुला दिया मैंने
उसके पीले अम्बर में भी
तेरे सब रंग भर दिए मैंने
उड़ती रेत सूखे होठों की तृष्णा
दोनों को ही प्यासा रखा मैंने
झुलसी उम्मीद को भी कहीं किसी
अर्थी पर ख़ाक कर दिया मैंने
फिर बरसे नयन बरसे काले बदल
और इस में भी मन भर लिया मैंने
जब टपके कुछ बूँदों में अरमान
आँसूओं में इन्हें छुपा दिया मैंने
आयें मेघ न बरसें यह मेघ
यहाँ दश्त बना दिया मैंने
प्यासी धरती प्यासा मन
दोनों को तरसा दिया मैंने
सवान बीता और पतझड़ आया
इंतज़ार में मौसम बिता दिया मैंने
कुछ सूखे पतझड़ के पतों को
जलाते-जलाते जंगल जला दिया मैंने
इस मौसम का कुछ साथ देने को
अरमानों को पतों सा गिरा दिया मैंने
खाली टहनियों कि तरह तन्हा ही
हो कर यह जीवन बिता दिया मैंने
फिर आई एक रात ठंडी-ठंडी सी
जिसको आग में तपा दिया मैंने
खुद अपना घर जला कर उस दिन
रोशन किया कुछ का जहाँ मैंने
हैं ठंडी सांसें साथ आज भी
इन्हें धुंध में गुमा दिया मैंने
कुछ सफ़ेद रंग कि बर्फ के साथ
अरमानों को सुला दिया मैंने