Saturday, August 20, 2016

हज़ार रंग आंखों में

हज़ार रंग आंखों में थे 
रंग सब छोड़ दिए मैंने 
एक तेरे रंग में रंगने को 
बसंत को उद्देळ दिया मैंने 

कलियाँ कब से बैठी थी 
कलियों को छोड़ दिया मैंने 
उन रंगों और उन खुश्बूँ को 
तेरे रंग में घॊल दिया मैंने 

जाने कब आयी ऋतू गर्मी की 
तेरी आस में भुला दिया मैंने 
उसके पीले अम्बर में भी 
तेरे सब रंग भर दिए मैंने 

उड़ती रेत सूखे होठों की तृष्णा 
दोनों को ही प्यासा रखा मैंने 
झुलसी उम्मीद को भी कहीं किसी 
अर्थी पर ख़ाक कर दिया मैंने 

फिर बरसे नयन बरसे काले बदल 
और इस में भी मन भर लिया मैंने 
जब टपके कुछ बूँदों में अरमान 
आँसूओं में इन्हें छुपा दिया मैंने 

आयें मेघ न बरसें यह मेघ 
यहाँ दश्त बना दिया मैंने 
प्यासी धरती प्यासा मन 
दोनों को तरसा दिया मैंने 

सवान बीता और पतझड़ आया 
इंतज़ार में मौसम बिता दिया मैंने 
कुछ सूखे पतझड़ के पतों को 
जलाते-जलाते जंगल जला दिया मैंने 

इस मौसम का कुछ साथ देने को 
अरमानों को पतों सा गिरा दिया मैंने 
खाली टहनियों कि तरह तन्हा ही 
हो कर यह जीवन बिता दिया मैंने 

फिर आई एक रात ठंडी-ठंडी सी 
जिसको आग में तपा दिया मैंने 
खुद अपना घर जला कर उस दिन 
रोशन किया कुछ का जहाँ मैंने 

हैं ठंडी सांसें साथ आज भी 
इन्हें धुंध में गुमा दिया मैंने 
कुछ सफ़ेद रंग कि बर्फ के साथ 
अरमानों को सुला दिया मैंने 

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