मेरा हश्र बस एक भटकते मुसाफिर सा रह गया
मंजिल सामने थी और मैं रास्ता पूछता रह गया
क्या कह के बहलाता अब इस दिल को मैं
जो भी इसने चाहा वोही इससे दूर हो गया
अब आलम यह है की नहीं चाहता कुछ भी
ख्वाहिशों के नाम यह खली मकान रह गया
आज भी दर-ओ-दीवार से मांगता बस वो पल
जिस पल मेरा यह होना भी न होना हो गया
मैंने सब कुछ है खोया उस वक़्त की जुस्तजू में
वो भी मेरा वक़्त था जो वक़्त
की सूली चढ़ गया
आज नहीं मांगता मैं इस वक़्त से कुछ
भी
मेरा जो कुछ था वो कब का मुझसे छीन गया
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