Tuesday, February 28, 2012

अपनी तो रवां होती है

अपनी तो रवां होती है रात आज उनके साथ होने से
और एक वोह हैं जो खुश होते हम पे सितम होने से

तेरे होते मैं थामूं कैसे इस दिल को अब धड़कने से
और तेरे जाते सम्भालूँ कैसे खुद को बर्बाद होने से

सरे बाज़ार बचूं कैसे में आज खुद बेआबरू होने से
रोकूँ कैसे ज़माने को इस हश्र का तमाशाई होने से

क्या हो आज अगर चल भी दूं दूर मैं तेरे इस कूचे से
और फिर बचूं कैसे तेरी याद में यूँही गर्क होने  से

कौन जाने क्या फरक पड़ा है मुझ पर तेरे होने से
देखना यह है की तू बचाए कैसे कपिल ख़ाक होने से

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