Monday, February 20, 2012

अजन्बी

ऐ अजन्बी तुम क्यों हर मोड़ पे यूँ मिल जाते हो,
 दो पल में ही मेरी हस्ती का सामान दे जाते हो।
कुछ पल रहते हैं बेहिस से हम यहाँ पर तनहा,
होश आने पे क्यों आँखों से ओझल हो जाते हो!

अजन्बी  तुम हर पल को बेमौल कर जाते हो,
क्यों एक पल के बदले उम्र का दर्द दे जाते हो।
मैं तड़पता हूँ यहाँ, हर बार मिलकर तुमसे,
क्यों दर पर आ कर बिन मिले चले जाते हो!

तुम बताओ कहाँ-कब करूं मैं इन्तीज़र तेरा,
तुम तो वक़्त-बेवक्त कहीं नज़र आते हो।
किस से पुछूं  मैं इस शहर में पता तुम्हारा
इस शहर में तो तुम अजन्बी नज़र आते हो।

क्या काहूँ और मैं तुमसे गुमनाम दोस्त मेरे,
क्यों अजन्बी हो कर भी दोस्त बन जाते हो।
देखते तो तुम आज भी मुझे हो गैरों के जैसे
क्यों ओसत हो कर  अजन्बी नज़र आते हो।

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