Monday, February 20, 2012

है दश्त यहाँ पर तो क्या

है दश्त यहाँ पर तो क्या,
कहीं तो ज़मीन हरी होगी।
रहा प्यासा मैं बरसों तो क्या,
कहीं तो यह बदरा बरसेगी ।

 उभरती कई तमनाएं दिल में,
कभी एक तमन्ना तो पूरी होगी ।
आज चल चुका हूँ मैं कश्ती मैं,
कभी तो यह माझी से पार लगेगी।

भीड़ का तो है बड़ा साथ अपना,
कहीं तो तन्हाई नसीब होगी।
 है रखा सर जांनॉ पे तेरे अपना,
कभी इसे जुल्फों की छांव मिलेगी।

हैं ज़ख्म मिले दिल को कितने,
 कहीं से तो एक चीस उठेगी।
दबा रखे हैं कब से आंसूं कितने,
कभी तो लहू की बूँद टपकेगी।

न रोको तुम टपकते लहू को मेरे, 
इस लहू के  साथ तेरी याद निकलेगी।
अटकती सांसें इस लहू के निकलने पर
तुम जाओ तभी कपिल की जाँ निकलेगी।

- कपिल बजाज

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