Saturday, August 23, 2014

साथ रहता था

साथ रहता था जो अब मिलता भी नहीं
सामने से गुज़रता है और पहचानता नहीं
अब कश्मकश-ऐ-ज़िन्दगी एक तन्हाई है
या ख़ुदा कहीं ये ही तेरा इरादा तो नहीं

आज भी मैं उसी की याद से कुछ  ज़िंदा हुँ
उसके सिवा दिल ने संजोया कुछ भी नहीं
उसके दिए चंद  फूल आज भी संभाले हैं
इनके सिवा, दौलत अपनी कुछ भी नहीं

क्यों है दुरीयाँ या ख़ुदा तेरी इस दुनिया में
और एक उम्र से ज़्यादा की महोलत नहीं
कितना बेज़ार हुँ की एक कदम चलता नहीं
मेरा उसके साथ के सिवा कोई सहारा नहीं

रंग थे जो सब जीने के तेरे साथ जुदा हो गए
अब मेरे पास सफ़ेद रंग के सिवा कुछ नहीं
सनी है ज़िन्दगी जाने कितने सन्नाटों से
कोई रंगरेज़ इसे को रंगने को  तय्यार नहीं

उठाये खड़ा हुँ इन थके हाथों से इस बोज़ को
पास इसे हल्का करने की लिए काँधा नहीं
वो ये जाने या न जाने या ख़ुदा बता देना
कि उनके सिवा मेरा यहाँ कोई भी नहीं 

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