Monday, March 16, 2015

कभी धड़कनों का शोर था

कभी धड़कनों का शोर था
आज खामोशियों का दौर है
तब गूँजती थीं मेरी ख्वाहिशें
आज सन्नाटों का अजब शोर है

आज बैठी हुई हैं धड़कनें
कहीं खो गई सारी हसरतें
कभी तेरे जाने का मलाल था
आज अपने होने का खार है

कभी वो दिल दूर होके पास था
आज पास होके भी बहुत दूर है
कभी तेरे आघोश कि चाह थी
आज वो दिल तेरी ज़ुल्फ़ से दूर है

हाथ बढ़ाया था मैंने भी कभी
कि तेरा दामन मेरे ही पास था
आज आके तू वो भी पूछ गया
दामन पे मेरा क्या इख्तियार है

ले गया छीन के मेरे ख़्वाब भी
जिन ख़्वाबों पे  मेरा इख्तियार था
तू क्यों छोड़ गया फिर साँसें मेरी
इस ज़िस्म से साँस लेना बेकार है

लिए बैठा हूँ आज भी उम्मीद तेरी
क्यों तुझे मेरी उम्मीद से इंकार है
न बन सका तू मेरा हमसफ़र तो क्या
हमनफ़स तेरी सूरत का इन्तिज़ार है

No comments:

Post a Comment